पेट, लिवर और किडनी पर कैसे असर डालते हैं डिशवॉश केमिकल


कभी आपने सोचा है कि जो आप Dish Bar और Dishwash Liquid अपने घर के बर्तन धोने में इस्तेमाल करते हो, उससे आपको क्या-क्या नुकसान होता है और पर्यावरण को भी कितना नुकसान होता है?

जो आप डिश बार और डिशवॉश लिक्विड इस्तेमाल करते हैं, जब आप बर्तन इनसे धोते हो, तो धोने के बाद अगर ध्यान से देखो, तो बर्तन पर सफेद-सफेद पाउडर जैसा कुछ जमा रहता है
आप उसी बर्तन में खाना खाते हो, तो वही चीज़ खाने के साथ आपके शरीर में चली जाती है
इससे कई तरह की बीमारियाँ होती हैं, जिनके बारे में लोगों को पता भी नहीं होता।



जैसे—

पेट और पाचन तंत्र की बीमारियाँ

गैस, एसिडिटी, पेट दर्द, उल्टी / मितली, दस्त,
आंतों में सूजन (Irritable Bowel जैसी समस्या)

कारण:
SLS / SLES, फॉस्फेट, डिटर्जेंट रेज़िड्यू



लिवर (जिगर) पर असर

लिवर पर ज़हरीला असर (Toxic Load बढ़ना)
फैटी लिवर का खतरा
शरीर की गंदगी साफ़ करने की क्षमता कम होना

कारण:
लंबे समय तक थोड़ी-थोड़ी मात्रा में केमिकल शरीर में जाना

जो बर्तन में सफेद लगा रहता है, वही खाने के माध्यम से आपके शरीर में जाता है और वह खून में मिल जाता है, जिससे—

किडनी की समस्या

किडनी को फ़िल्टर करने में ज़्यादा मेहनत
धीरे-धीरे किडनी डैमेज का खतरा

कारण:
केमिकल्स का शरीर में जमा होना



सांस से जुड़ी बीमारियाँ

एलर्जी
गले में जलन
सांस फूलना
अस्थमा ट्रिगर होना
(खासकर बच्चों और बुज़ुर्गों में)

त्वचा में एलर्जी और जलन

इसमें SLS / SLES, आर्टिफ़िशियल खुशबू, कलर होते हैं
संवेदनशील त्वचा वालों में—
रैश, लालपन, जलन

कारण:
तेज़ खुशबू और वाष्प (fumes)

हार्मोन गड़बड़ी (Endocrine Disruption)

थायरॉइड की समस्या
महिलाओं में पीरियड अनियमित
पुरुषों में हार्मोन असंतुलन

कारण:
सिंथेटिक फ्रेगरेंस और केमिकल एडिटिव्स

बच्चों के लिए ज़्यादा जोखिम

बच्चों के बर्तन (दूध की बोतल, कटोरी) में केमिकल का असर ज़्यादा हो सकता है।




और इससे पर्यावरण को भी बहुत नुकसान होता है।
जो भी ये डिश बार और डिशवॉश लिक्विड बनते हैं, उन्हें बनाने में कई तरह के केमिकल इस्तेमाल होते हैं।
जिस फ़ैक्ट्री में ये बनते हैं, वहाँ से निकलने वाला केमिकल नदियों और नहरों को गंदा करता है



और जो आप अपने घर में इसका इस्तेमाल करते हो, जब भी आप बर्तन धोते हो, तो जो झाग बनता है और जो फ्रेगरेंस आती है, वो सब केमिकल होता है।
वही झाग और केमिकल नालियों में जाता है, फिर नदियों और नहरों में मिल जाता है।



इसी कारण नदियों में सफेद झाग बनने लगा है।
इतने सारे केमिकल की वजह से नदियों की मछलियाँ मर जाती हैं
जो बच भी जाती हैं, उनमें कई तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं।
जब वही मछलियाँ इंसान खाता है, तो लोगों को भी कई तरह की बीमारियाँ होती हैं।

आप उदाहरण के तौर पर दिल्ली की यमुना नदी को देख सकते हैं—
कितना काला पानी है और उसमें कितना सफेद झाग होता है।
ये सब हमारी वजह से होता है

हम सरकार को दोष देते हैं, लेकिन जब आप खुद ये इस्तेमाल ही नहीं करोगे,
तो आपके नाले और नदियाँ गंदी भी नहीं होंगी,
और पर्यावरण भी साफ-सुथरा रहेगा।


अब आप कहोगे कि तो फिर हम क्या इस्तेमाल करें?

अगर इस्तेमाल करना ही है, तो आप—

  • लकड़ी की राख

  • या गोबर के उपले जलाने से बनी राख

इस्तेमाल कर सकते हैं।
इससे कोई बीमारी नहीं होती, क्योंकि इसमें कोई केमिकल नहीं होता
अगर ये शरीर में चला भी जाए, तो इससे कोई नुकसान नहीं होता।

या फिर आप
थोड़ा नींबू और नमक मिलाकर भी बर्तन धो सकते हैं,
जो कीटाणुओं को नष्ट करता है।



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